Essay On Paryavaran Sanrakshan

Essay On Paryavaran Sanrakshan-30
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प्रस्तुत पुस्तक स्वयं में बहुआयामी है परंतु इसकी सार्थकता तभी है जबकि पाठक इसमें उठाए गए बिदुओं से मन से जुड़ जाएँ। यदि पर्यावरण हमारे चिंतन के केंद्रबिंदु है तब यह पुस्तक गीता-कुरान की भाँति पर्यावरण धर्म की संदेश वाहि का समझी जायगी। हमारा विनीत प्रयास यही है कि पाठक आनेवाली शताब्दी की पदचाप को पूर्व सुन सकें और रास्ते के काँटों को हटाकर संपूर्ण जीवन-जगत् के जीवन को तारतम्य और गति प्रदान कर सकें। विकास और विनाश की धाराएँ एक साथ चलें-कभी समानांतर और कभी एक-दूसरे को काटती हुई-तो भला किसको आश्चर्य नहीं होगा ?

लेकिन यह आश्चर्य आज का सत्य है। आप इसे बीसवीं शताब्दी का परम सत्य भी कह सकते हैं। एक ऐसा भयानक सत्य है यह जो आगे आनेवाली शताब्दियों के सामने दो विराम चिह्न रखता है, एक प्रश्नवाचक और दूसरा पूर्ण विराम। विज्ञान की ताबड़तोड़ भाग-दौड़, मनुष्य का अपरिचित-असंतुष्ट लालच, तेजी से क्षत-विक्षत होनेवाले प्राकृतिक संसाधन, और प्रदूषण से भरा-पूरा संसार उजड़ता हुआ-ये सब आखिर कैसा चित्र उभारते हैं ?

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार– आज हमारा पर्यावरण तेजी से प्रदूषित हो रहा हैं.

यह प्रदूषण मुख्य रूप से तीन प्रकार का हैं, प्रदूषण नियंत्रण/रोकने/ संरक्षण के उपाय– प्रदूषण ऐसा रोग नहीं हैं जिसका कोई उपचार न हो.

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जितनी तेजी गति से विकास की ओर बढ़ रहे हैं क्या उतनी ही तेज गति से विनाश हमारी ओर बढ़ रहा है ? मानवता के सामने यह एक विराट् प्रश्नचिह्न है। यदि इसका सही समाधान कर लिया गया तो ठीक, नहीं तो संपूर्ण जीव-जगत् एक पूर्ण विराम की स्थिति में आकर खड़ा हो जाएगा। प्रश्नवाचक या पूर्ण विराम !! प्रस्तुत पुस्तक में इन्हीं दो प्रश्नों को सामने रखकर हमने अपने पाठकों से सीधा संवाद करने की चेष्टा की है। पुस्तक में आठ खंड हैं जो एक-दूसरे से पृथक होते हुए भी आपस में जुड़े हुए हैं। शताब्दी के सभी समकालीन लोगों की तरह हमारी भी इच्छा है कि मानव की बढ़ती हुई आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप उसका विकास हो; लेकिन विकास की यह पटकथा विनाश से धरातल पर न लिखी जाए। इस विश्वव्यापी चिंता का कारण है पर्यावरण प्रदूषण। पुस्तक के प्रथम खंड में इसी का विवेचन किया गया है। शीर्षक है-पर्यावरण शिक्षा और प्रदूषण के प्रकार। इसके पश्चात् आता है प्रदूषण का महामायाजाल। दूसरा खंड इसी पर आधारित है। हमारे चारों ओर प्रदूषण का एक ऐसा वितान फैला है, जिससे मुक्ति पाना असंभव-सा लगने लगा है। लेकिन इस भस्मासुर की सृष्टि आखिर किस शंकर ने की ? वायु और जल, धरती और आकाश, और यहाँ तक कि अंतरिक्ष भी प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं। प्रदूषण ने आज मानव के सामने जो चुनौतियाँ खड़ी की हैं, वे सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। तृतीत खंड में इन्हीं का उल्लेख किया गया है। शीर्षक है-प्रदूषण का कुफल। चौथे खंड में इस दानव से छुटकारा पाने के कुछ सुझाव वर्णित हैं। शीर्षक है-भविष्य के लिए शुद्ध पर्यावरण कैसे ?

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प्रस्तावना– मनुष्य इस पृथ्वी नामक ग्रह पर अपने अविर्भाव से लेकर आज तक प्रकृति पर आश्रित रहा हैं. प्रकृति ने पृथ्वी के वातावरण को इस प्रकार बनाया हैं कि वह जीव जंतुओं के जीवन के लिए उपयुक्त सिद्ध हुआ हैं. पर्यावरण संरक्षण– मनुष्य ने सभ्य बनने और दिखने के प्रयास में पर्यावरण को दूषित कर दिया हैं.

पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखना मानव तथा जीव जंतुओं के हित में हैं.

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